Monday, May 7, 2012

"प्रश्न"

क्या कभी
कांच के गिलासों को भी लगती होगी
"प्यास"

नंगी सड़क पर
चिलचिलाती लू ने भोगी होगी भला
"चिपचिपाती उमस"

क्या कभी
साहब के झबरे कुत्ते को भी
... लगी होगी
"भूख"

क्या कभी किसी कुर्सी ने भी पूंछा होगा ये "प्रश्न"

*amit anand

5 comments:

  1. सुन्दर अभिव्यक्ति......

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  2. कहाँ सोचते हैं हम कुछ भी अपनी प्यास के आगे

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  3. गहन अभिवयक्ति ...!शुभ्कम्नयेन ...!!

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  4. वाह …………गहन अभिव्यक्ति।

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