
चलो वीर
चलो चलते हैं,
चलते हैं उस ठावं
छोड़ अपना
गाँव,
अपना घर
अपने खेत
तीन साल की बेटी
खांसती बीवी
अँधा बूढ़ा बाप
सब छोड़!
छोड़ के चल
गाँव की तलैय्या
सोती हुयी डहर
पसरा हुआ बाग़
सब छोड़!
चल वीर
चलते हैं
शहर...
तोड़ते हैं अपने
बदन
अपनी उम्मीदों के साथ,
चलते हैं
भूखी आँतों का
राग सुनने
सुलगती दुपहरियों पर
प्यास भुनने,
चल
कुछ तिजोरियों को
जरूरत है
हमारे खून की !!
*amit anand
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