Friday, October 4, 2013

क्या लिखूं

क्या यार??
फिर से.......
क्या लिखूं?

बोलो?

लिखूं
अस्पताल /डॉक्टर / जवान जख्मी लड़का / बूढा गरीब बाप
रेहान /उधार /जेवर /कर्जा
क्या लिखूं

लिखूं
पसीजा हुआ डॉक्टर का दिल
सफल ओप्रेसन
अस्पताल के मालिक की गालियाँ
बकाया पैसे की मांग लिखूं ?

लिखूं
पास की रेल पटरी पर
क्षत विक्षत मिली अज्ञात वृद्ध की लाश

गाँव के लोग
सफ़ेद चादर
अस्पताल में छटपटाता बेटा

पञ्च
पंचायत /धरम/करम
और
चुटकी भर अबीर

या
लिखूं

"कबीर"

*amit anand

Sunday, January 20, 2013

कन्या पुष्प

समाज की
ठिठुरती ठंढ मे
फूट पड़ते हैं
लड़कियों के फूल

मटियाली
हरी डंडियों पर
कोमल
पीले सरसों के से
कन्या पुष्प,

महकने लगता है
पूरा सीवान
खेत खलिहान
गमक उठते हैं,

आसमान से बरसती ठंढ
और
गहरे कुहासों के बीच
खिलखिलाती
रहती है
लड़कियों की
पौध,

कुछ
नन्हे फूल
रौंद दिए जाते हैं
आवारा जंगली जानवरों के खुर तले
कुछ को मार जाता है
विपत्तियों का पाला,

फिर भी
कुछ फूल
अपनी ही जिद पर
अडिग हो
गदरा जाते हैं
अपनी जड़ों पर उगा लेते हैं
अपने स्वप्न फल!

पर
नियति...
उनके
शेष रहे जिद्दी सपने
देर ही सही
पीस दिए जाते हैं
गृहस्थी के कोल्हू मे...

निकले हुए
तेल से
मंदिर का दीया
जलता है!!

आखिर नियति चक्र
लड़कियों को
बार-बार
"छलता है"

*amit anand

Wednesday, December 26, 2012

(यथा राजा तथा प्रजा )

बड़ा निर्लज्ज है मेरा 
मकान मालिक 

मांगने को तो माचिस की तीलियाँ तक 
उधार मांग लेता है 

हाँ 
मगर देने को 
दुआ तक नहीं देता 

सरकारी मुलाजिम है "मकान मालिक"

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(यथा राजा तथा प्रजा )

Thursday, November 15, 2012

हिन्दू और मुसलमान


अरसा पहले
जब मंदिरों मे हुआ करती थी
सच मुच की आरती ,
मस्जिदें अजान मे गुनगुनाती रहती थीं,

तब
जबकि भूख ...
माँ के हाथों की लज्जत मे हुआ करती थी,

उसी दौर मे
एकाएक पागल हों गया था आदमी
कलाईयों मे राखी की जगह
तलवारें आ गयी थीं
औरतें -बच्चे काट डाले गए थे
जानवरों की तरह,
हाँ एक दम उसी दरमियाँ
जब
चूल्हों की आग
सुलगने लगी थी
दूसरों के घर
और
बेटियों के बदन पर....

उसी मारकाट के दौर मे
जब की
दो भाइयों ने
बाँट लिया था अपना आँगन,

कुछ फसलें कट चुकी थीं
कुछ का कटना बाकी था

वो दौर......

ओह
उस रेल-पेल
भागम भाग
मार काट मे

दो भाइयों की लाशें
जिन्दा बच गयीं थीं
जिन्हें हम आज
हिन्दू और मुसलमान कहते हैं!
*amit anand

जाने दो

मैं दंगाई नहीं

मैं आज तक

नहीं गया

किसी मस्जिद तक

किसी मंदिर के अन्दर क्या है

मैंने नहीं देखा,



सुनो

रुको

मुझे गोली न मारो

भाई

तुम्हे तुम्हारे मजहब का वास्ता

मत तराशो अपने चाक़ू

मेरे सीने पर,



जाने दो मुझे

मुझे

तरकारियाँ ले जानी हैं



माँ

रोटिया बेल रही होंगी!



*amit anand 

गुनाह

बरसती दुपहरियों मे बरामदे पर चारपाई डाले हुए मन .... हवाओं के साथ बहती आती हुयी बूंदों मे भीगता ... सिहरता अतीत की ओर भागता है!
बीते दिन याद आते हैं.... एक अनदेखी लेकिन चम्पई एहसास समेटे हुए एक लड़की... जिसकी सांस सांस मे कविता के शब्द झरा करते थे.... मंदिर की घंटियों के से शब्द!

याद आते हैं बीते हुए दिन.... तकिये मे सिर छिपाए हुए, 
आरती के सुर.... शाम के धुंधलके मे मस्जिद से आती हुयी अजान सी उसक
ी बोली.... उबलते हुए दूध मे अभी अभी डाले गए केशर की सी यादें भीतर भीतर घुलती हैं!

अपने पाप..... अपना छल याद आता है, बारिशें हैं की जोर पकडती जा रहीं! भीतर की ढृढ़ दीवाल दरक रही हों मानो
उसकी पावनता... उसका अपनापन....
ओह ओह
तकिया पानी मे नहीं भीगा शायद..... आँखें गीली हैं मेरी!

मेरे ईश्वर!
भले ही मेरे गुनाह ना माफ़ कर!

लेकिन उस मासूम फ़रिश्ते को खूब सारी खुशियाँ देना...


*amit anand

डर

अब तो नींद से भी डर लगता है..

दिन भर की मक्कारियां बुनता मन, रात चादरों मे सलवटें डालता हुआ, ऊंघता, सिर झटकता ... बाल नोचता है....
एक कतरा नींद की मन्नतें मांगता ...मन.... जब तब सो भी जाता है / गीली तकियों मे मुंह छिपाए...
पर पाप अपना हिसाब मांगने वहाँ भी हाज़िर ....
मन जाल मे फंसी मछली की तरह कसमसाता है और सपने हैं कि एक एक कर आते जाते हैं....
पुराने लोग.... आ खड़े होते हैं, चिढाते हुए... आतुरता बढाते हुए....
बचपन की खोई हुयी "ड्राइंग बुक" खुल जाती है .... एक टांग पर नाचता हुआ मोर... अल्हड हाथों से भरा हुआ भोथरा रंग... सितारों भरी फ्रोक पहन कर नाचती हुयी लड़की....

सपने मन को शार्पनर मे डाल कर पेंसिल सा उमेठते रहते हैं.... अतीत की परतें .. महीन सी छिलकों की तरह आस पास बिखरती जाती हैं....
तकिया .... भीग चुका तकिया .. कसमसाता रहता है भोर तक....

खिडकियों पर झांकती हुयी अंगूर की बेल पर दो नन्ही बुलबुलें कोई गीत गा रही हैं,
बीता हुआ गीत...
सूरज रोशनदानो से झांकता हुआ, मुंह पर ठहर सा गया है... सिरहाने चाय ठंडी हुयी जा रही...
मन है कि अभी भी नींद की दहशत मे हिचकियाँ भर रहा...

*amit anand