Sunday, April 15, 2012

पहाड़ी मैना

पहाड़ी मैना
तुम्हारी लाल चोंच याद आती है,

याद आता है
तुम्हारे स्निग्ध परों का फैलाव
तुम्हारी गोल मासूम आँखें
तुम्हारी मटकती गर्दन
टप्प हिलती तुम्हारी पूँछ,

तुम्हारे गीत याद आते हैं
पहाड़ की मैना,

मैंने
आज फिर रचे हैं कुछ नए गीत
जिसमे पहाड़ हैं
नदियाँ/झरने
और
देवदार हैं,

मैना
तुम्हारी जादुई आवाज मे सुनना है
मुझे
मेरा गीत,

सुनो
मैं तुम्हे अपना गीत भेजता हूँ

तुम
बस
अपना पता बता दो!

*amit anand

शहर की नंगी सड़क

उठो साथी
कदम बढाओ मेरे साथ
मुट्ठियाँ भीचों
भरो एक हुम्म्कार,

एक जुट हों जाओ
साथ-साथ आओ,

आओ
बाँट लेते हैं शहर का हर चौराहा
सारी लाल बत्तियां,

बाँट लेते हैं
सारी कालोनियां, ओफिसें,बाजार

बांटना जरूरी है
क्योंकि-
हमें भी चाहिए एक मकान
इन्ही चौराहों,लाल बत्तियों/ऑफिसों के एन बीच,

आधी "लैला" के शुरूर मे
धुत्त
गुमानी लंगड़ा बन जाता है
"माओत्से तुंग" या फिर कार्ल मार्क्स

और
कुचलता है
शहर की नंगी सड़क को
अकेले मे

"अपनी अकेली टांग के साथ"

*amit anand

"कटिया का गीत"

पक चुके
गेहूं के खेतों पर
दरातियाँ चलती हैं

कुछ
रंगीन चूड़ियाँ
खुरदुरी हथेलियाँ
छूती..
खनकती फिरती हैं
गेहूं का पोर पोर,

जड़ों से कटते हुए
गेहूं
बड़े इत्मीनान से सुनता है
एक गीत-
"कटिया का गीत"

बोल झरते जाते हैं
और
सरहद पर शहीद सैनिकों की तरह
जमीन पर पसरते जाते हैं
पके हुए गेंहूँ,

हाँ पर..
जड़ें अभी भी जमीन से जुडी हुयी ही रहती हैं!

*amit anand

बहती नदिया से तुम

बहती नदिया से तुम
कल-कल
निर्मल
शीतल,

थिर किनारों सा
मेरा अस्तित्व

ना तुम ठहरते हों
ना मैं साथ चल पता हूँ!

*amit anand

मैं

वहम है तुम्हारा

मैं
नहीं नहीं मरता
तुम्हारी
काटी हुयी लकीरों से

ना ही मुझे चढ़ता है
बुखार..
तुम्हारे तमाम नीम्बू मिर्चें
बेकार/ बेअसर हैं मुझ पर,

कुछ भी कर लो..

तुम
अपनी मक्कारियों के साथ -साथ
मुझे भी क्यूँ नहीं दे देते
एक सह-अस्तित्व

आखिर
मैं
तुम्हारे भीतर का शुभ हूँ
तुम्हारा कोमल पक्ष हूँ
"मैं"

*amit anand

Sunday, March 25, 2012

ऊब

रोज़ रोज़ ही
लगभग एक से संवाद
सीमित शब्द,

एक सी भावभंगिमाएँ
... एक तरह के वस्त्र

रोज़ रोज़
घुटनों के बल बैठना

ऊब गया हूँ
इस
काठ के मंच से!

दर्शक बदलते जाते हैं
पर
तुम्हारे मंच का कथानक नहीं बदलता!
*अमित आनंद

रंग मंच

तुम्हारा -रंग मंच
तुम्हारे पात्र
तुम्हारा कथानक
तुम्हारी ध्वनियाँ
प्रकाश तुम्हारा,

तुम्हारा निर्देशन
तुम्हारा अनावरण
पटाक्षेप तुम्हारा,

सुनो-
बहुत त्रासद है
तुम्हारी एकांकी,

झरती आँखें
भीड़ की सिसकियाँ
मैं नहीं सह सकता अब,

मेरा आखिरी मंचन करो
या फिर
अब मुझे
नेपत्थ्य दे दो!

*amit anand