Thursday, January 6, 2011

कन्या-भ्रूण

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मत रोको माँ!
मुझे मिट जाने दो

ताकि

इस अग्निपरीक्षा से

गुजरना न पड़े मुझको,

मिट ही जाने दो

इस अबोली/ अदेखी को

ताकि

बार बार मिटने का
दुःख
बाकी न रह जाए

तुम्हारी तरह!


मत रोको माँ!


अपनी कोख की तरफ बढ़ते

इन हत्यारे हाथों को,


अलबत्ता
रोक लो
ये आंसू...
ये छटपटाहट

क्योकि-

इनमे तुम मुझे छिपा नहीं पाओगी

मैं

अपूर्ण ही सही
पहचान ली गयी हूँ!!

*amit anand

Friday, September 3, 2010

गवाहियां



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तुम
रात फिर आयीं थीं
शायद!!

मैंने
महसूस किया था
बुखार से तपते अपने माथे पर
तुम्हारी
ठंढी छुवन!

सिरहाने रखा
पानी का गिलास!

सीने पर लुढ़क आई
ऐनक,
तकिये के पास बिखरी
डायरी,

सब
तुम्हारे यहाँ आने की
गवाहियां दे रहे थे
आज सुबह!

*amit anand

Thursday, August 26, 2010

"तरई"


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जिजिया!
माई कहाँ गयी?

साढे चार साल का नन्हका
रिरियाता है
सात साल की "तरई" की गोद मे,

कमर तक पानी मे
खड़ी
भूख से ऐंठती अंतड़ियों के लिए
कुछ खोजती
तरई
जवाब नहीं दे पाती,

कुछ भी!!

सुना है
बिछिनैया फिर से उफान पर है!

*amit anand

Thursday, July 22, 2010

घर

तेरी गली मे
मेरी भटकन के चार-छः दिन

सब कुछ जैसे
मेरा सपना !
धुले धुले दिन,
खिली खिली शाम
स्याह - सर्द रातें!

मैं भटक सकता था
एक पूरी उम्र
तेरी गली मे!

लेकिन मेरे
अनदेखे प्रेम
मुझे अब
घर भी जाना है!!

*amit anand

खो चुका हूँ

चिप चिपाती उमसती
चिडचिडी दोपहरी में
सरपतों की फुनगियों से लगे
चीरे की तरह
तुम्हारी याद!!

अकारण!

चटकती ज़मीन
दरारों भरे खेत पर
आवारों बादलों के झुण्ड सी
तुम्हारी स्मृतियाँ!!

अर्थहीन!!

ऊब सी है
तुम्हारी याद
तुम्हे सोचना
अब "टाइम पास" लगता है,

मीत मेरे
मान लो
की-
तुम्हे अब
"खो चुका हूँ मैं"

*amit anand

सपने

दिन भर का थका हारा
"मोलाई"
रात लौटता है
अपने पांच गुना दस की पन्नी मे,

अपने सारे सपने उतार फेंकता है
दिन भर की मैल की तरह
और
नमक प्याज के साथ
तीन दुहाट्ठी रोटियाँ खा
मोलाई
तान लेता है
बेफिक्री की चादर!

कल के सपनो के लिए
मन मे
जगह जो बनानी है!!

*amit anand

"निहोर"

जाने कितनी
होली
कितने
दिवाली के दिए,
धान की कटिया
सावन के बादल
बीत गए,

साल दर साल
बढ़ता गया
खिड़की से सटा
नीम का पेड़
झर गए
चंपा के सारे फूल-पत्ते!

बिसर गयी
धुंआ उगलती वो भाप गाडी
जिससे
निकला था "निहोर"
परदेश को!

अब तो
मेले से लायी
निहोर की शेष बची चूड़ियाँ
तीन पत्तों के पीछे बची दो बिंदी
थिगलियों वाली चादर
पोस्टमैन का थैला
चूल्हे की खाली भदेली
माघ की एक आध रात ही
याद रख पाती है
निहोर को
और
सिसक पड़ते हैं तमाम असबाब!!

*amit anand